स्वार्थ से मति अंध, सेवा से मति शुद्ध

मूर्ख लोग काम टालते हैं।  वो उसपे टालेगा , वो उसपे टालेगा। और जब यश और सफलता होगी तो छाती फुलाके आगे आएगा। और विफलता होगी तो 'मैं तो कहता था कि' ....'मैं तो कहता था कि ऐसा नहीं करना चाहिए'। अभी ऐसा किया उसने किया , पहले उसने ऐसा किया..अथवा तो काम बिगड़ गया तो बोले ईश्वर की मर्ज़ी। अच्छा काम करता है तो बोले हमने किया.. हमने किया और जो बिगड़ा है वो बोले ईश्वर की मर्ज़ी। इसका मतलब ईश्वर बिगाड़ने के काम सब ईश्वर कर रहा है और बढ़िया काम तू ही कर रहा है। ऐसी मति अंध हो जाती है स्वार्थ से। और सेवा से मति हो जाती है शुद्ध।

बढ़िया काम होता है तो बोले ईश्वर की कृपा थी। महापुरुषों का प्रसाद था। शास्त्रों का प्रसाद था। मेरे कार्य के पीछे ईश्वर का हाथ था गाँधी कहते थे | गुरूजी कहा करते थे जुदा जुदा जगह पर काम करने वाली  कोई महान शक्ति है।  लोग बोलते है लीला ने किया, लीला ने किया, लीला नहीं करता है। नाम तो लीला शाहजी है।  लेकिन अपने आप को वो 'लीला नहीं ! कुछ नहीं ! क्या? जुदा जुदा जगह पर काम करने वाली  कोई महान शक्ति है। हम लोग तो निमित्त मात्र है '| और कही गलती हो गयी तो भाई ! क्या करूँ? हम तो पढ़े लिखे नहीं है ? हमारी गलती हो तो आप क्षमा कर देना। कितनी नम्रता है उन महापुरुषों की।

पूज्य बापूजी - ऑडियो सत्संग - “सेवा ही भक्ति“

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